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मिर्ज़ापुर: द मूवी (Mirzapur: The Movie) के साथ भारत की सबसे चर्चित क्राइम फ्रेंचाइज़ी अब बड़े पर्दे पर आ गई है। इस मिर्ज़ापुर द मूवी रिव्यू में हम देखेंगे कि वेब सीरीज़ का वह खूनी खेल थिएटर में कितना असर छोड़ता है। सत्ता की बेरहम लड़ाई, ठेठ देसी हिंदी संवाद, कभी भी पलट जाने वाले किरदार और डार्क ह्यूमर — मिर्ज़ापुर की दुनिया हमेशा एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमती रही है: गद्दी किसके हाथ में होगी, और उसे पाने के लिए कितना खून बहेगा?
फिल्म इसी जानी-पहचानी दुनिया को सिनेमाघर के अनुभव में बदलने की कोशिश करती है। कालीन भैया (Kaleen Bhaiya), गुड्डू पंडित (Guddu Pandit) और मुन्ना त्रिपाठी (Munna Tripathi) जैसे बड़े किरदार लौटते हैं, वहीं रवि किशन (Ravi Kishan) का बब्बन/बबुआ यादव एक नया आपराधिक खतरा बनकर सामने आता है। नतीजा ऐसी फिल्म है जो उम्मीद के मुताबिक हिंसा, हंसी और पुरानी यादें तो परोसती है, लेकिन लंबे रनटाइम और भीड़ भरे स्क्रीनप्ले से जूझती भी दिखती है।
फिल्म का निर्देशन गुरमीत सिंह (Gurmmeet Singh) ने किया है, जबकि इसके क्रिएटर और लेखक पुनीत कृष्णा (Puneet Krishna) हैं। यह 4 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। प्रोड्यूसर रितेश सिधवानी (Ritesh Sidhwani) और फरहान अख्तर (Farhan Akhtar) हैं, और कासिम जगमगिया (Kassim Jagmagia) व विशाल रामचंदानी (Vishal Ramchandani) को-प्रोड्यूसर की भूमिका में हैं। फिल्म को A सर्टिफिकेट मिला है और इसकी बताई गई लंबाई करीब 3 घंटे 17 मिनट है।
मिर्ज़ापुर: द मूवी — एक नज़र में ज़रूरी जानकारी
| श्रेणी | जानकारी |
|---|---|
| फिल्म का नाम | मिर्ज़ापुर: द मूवी (Mirzapur: The Movie) |
| रिलीज़ डेट | 4 सितंबर 2026 |
| निर्देशक | गुरमीत सिंह |
| क्रिएटर और लेखक | पुनीत कृष्णा |
| प्रोड्यूसर | रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर |
| को-प्रोड्यूसर | कासिम जगमगिया और विशाल रामचंदानी |
| मुख्य कलाकार | पंकज त्रिपाठी, अली फज़ल, दिव्येंदु, रवि किशन और अन्य |
| भाषाएं | हिंदी और तेलुगु |
| जॉनर | एक्शन, क्राइम और थ्रिलर |
| सर्टिफिकेशन | A |
| रनटाइम | लगभग 3 घंटे 17 मिनट |
| थिएटर रिलीज़ | देशभर में |
| फाइनल रेटिंग | 3.5/5 |
Amazon की आधिकारिक घोषणा में फिल्म की थिएट्रिकल रिलीज़, निर्देशक, क्रिएटर, लेखकों और प्रोडक्शन क्रेडिट्स की पुष्टि की गई है। BookMyShow पर यह फिल्म हिंदी और तेलुगु में लिस्टेड है, और सर्टिफिकेशन से जुड़ी रिपोर्ट्स के अनुसार इसका फाइनल रनटाइम लगभग 197 मिनट है।
मिर्ज़ापुर: द मूवी की कहानी
यह फिल्म किसी बिल्कुल अलग-थलग कहानी के तौर पर पेश नहीं की गई है। यह मिर्ज़ापुर यूनिवर्स का एक और अध्याय खोलती है और इसे पहले सीज़न की घटनाओं के साथ-साथ रखा गया है। इसी वजह से यह ताज़ा सीज़न का सीधा सीक्वल कम और फ्रेंचाइज़ी की मौजूदा टाइमलाइन के भीतर एक सिनेमाई साइड-स्टोरी ज़्यादा लगती है।
मुख्य टकराव एक बार फिर ताकत, वफादारी और बदले पर टिका है। कालीन भैया अपराध और राजनीति के ढांचे में अब भी अहम हैसियत रखते हैं, जबकि गुड्डू पंडित महत्वाकांक्षा और निजी गुस्से से बनी अपनी जगह से चालें चलता है। मुन्ना त्रिपाठी की मौजूदगी इस संघर्ष में भावनात्मक अस्थिरता घोल देती है, क्योंकि उसके फैसले धैर्य से नहीं बल्कि अहंकार और आवेग से निकलते हैं।
फिल्म में रवि किशन द्वारा निभाए गए बब्बन/बबुआ यादव के रूप में एक नया खतरा भी जुड़ता है। उसकी आपराधिक गतिविधियां और उससे जुड़ा ड्रग्स का झगड़ा पहले से जमे सत्ता-तंत्र पर दबाव बनाते हैं। सामने आई कहानी की जानकारियों में जैसलमेर के एक ड्रग लॉर्ड का भी ज़िक्र है, जिसकी योजना मिर्ज़ापुर पर कालीन भैया की पकड़ के लिए खतरा बन जाती है।
कहानी कई परतों वाले तनावों के ज़रिए आगे बढ़ती है:
- अपनी कुर्सी बचाने की कालीन भैया की कोशिश।
- सत्ता के लिए गुड्डू की कभी न खत्म होने वाली भूख।
- खतरों पर मुन्ना की अप्रत्याशित प्रतिक्रिया।
- बब्बन यादव के आपराधिक इरादे।
- ड्रग्स, इलाके और राजनीतिक रसूख को लेकर रंजिशें।
- ऐसे निजी रिश्ते जिन्हें धंधे से अलग करना मुश्किल हो जाता है।
फिल्म का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इन किरदारों का अपना इतिहास पहले से मौजूद है। एक छोटी-सी बातचीत में भी पुराने धोखों, पारिवारिक कलह और सत्ता-संघर्ष का वज़न महसूस होता है। जब भी दो किरदार आमने-सामने आते हैं, दर्शक को लंबी सफाई की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि उनका रिश्ता सीरीज़ में पहले ही गढ़ा जा चुका है।
दूसरी तरफ, यही ढांचा नए दर्शकों के लिए रुकावट भी बनता है। जिन्होंने मिर्ज़ापुर नहीं देखी, उन्हें किरदारों की मंशा, संदर्भ और भावनात्मक प्रतिक्रियाएं समझने में दिक्कत हो सकती है। फिल्म मानकर चलती है कि दर्शक पहले से जानते हैं कि कुछ किरदार एक-दूसरे पर भरोसा क्यों नहीं करते और मामूली-सा फैसला भी खून-खराबे तक कैसे पहुंच जाता है।

जानी-पहचानी दुनिया, लेकिन थिएटर वाले पैमाने पर
मिर्ज़ापुर का थिएट्रिकल रूप फ्रेंचाइज़ी की पहचान को पूरी तरह नहीं बदलता। यह न तो चमक-दमक वाली एक्शन फिल्म बनती है और न ही कोई रूटीन बॉलीवुड क्राइम ड्रामा। इसके बजाय इसमें वही खुरदुरा माहौल, गंवई बोली, अपराध की राजनीति और अचानक टूट पड़ने वाली क्रूरता बची रहती है, जिसने सीरीज़ को लोकप्रिय बनाया था।
बड़ा पर्दा फिल्म को एक्शन सेट-पीस, भीड़ की प्रतिक्रियाओं और धमाकेदार एंट्री के लिए ज़्यादा जगह देता है। कुछ सीन साफ तौर पर थिएटर के दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं, खासकर बड़े किरदारों की वापसी, आमने-सामने की भिड़ंत और क्लाइमैक्स वाले पल।
फिर भी यह भव्यता हर सीक्वेंस में बराबर काम नहीं करती। बड़ा सेट अपने-आप किसी दृश्य को दमदार नहीं बना देता। सबसे असरदार सीन अब भी वही हैं जिनमें किरदार फैसले ले रहे होते हैं, कुछ छिपा रहे होते हैं या एक-दूसरे की वफादारी परख रहे होते हैं। कमज़ोर हिस्से वे हैं जहां फिल्म किसी एक्शन सीक्वेंस को खींच देती है या मूल संघर्ष को आगे बढ़ाए बिना बस हलचल जोड़ देती है।
यह फर्क इसलिए मायने रखता है क्योंकि मिर्ज़ापुर तब सबसे दिलचस्प होती है जब उसकी हिंसा किरदारों के फैसलों से जन्म लेती है। गोलीबारी और धमकियों का असर इसलिए होता है क्योंकि दर्शक समझते हैं कि हर किरदार क्या पाना या क्या बचाना चाहता है।
कालीन भैया के रूप में पंकज त्रिपाठी
पंकज त्रिपाठी (Pankaj Tripathi) इस फिल्म के सबसे भरोसेमंद कलाकारों में बने रहते हैं। उनके कालीन भैया की ताकत है नियंत्रण। रुतबा जताने के लिए उन्हें हर सीन में आवाज़ ऊंची नहीं करनी पड़ती। एक ठहराव, एक नज़र या नपी-तुली एक लाइन लंबे भाषण से ज़्यादा कह जाती है।
कालीन भैया इसलिए असर करते हैं क्योंकि उन्हें ऐसे सीधे-सादे गैंगस्टर की तरह नहीं लिखा गया जो हर मुश्किल का हल गोली से निकाले। वे एक रणनीतिकार भी हैं, जो सब्र की कीमत जानते हैं। उनकी असली ताकत यह है कि वे सामने वालों को यकीन दिला देते हैं कि वे हमेशा कई कदम आगे चल रहे हैं।
त्रिपाठी का अभिनय खासतौर पर उन दृश्यों में चमकता है जहां किरदार को डर ज़ाहिर किए बिना किसी खतरे का जवाब देना होता है। तनाव उस फासले से पैदा होता है जो कालीन भैया की असल जानकारी और दूसरों के अंदाज़े के बीच मौजूद रहता है।
कई समीक्षाओं ने पंकज त्रिपाठी को फिल्म की बड़ी ताकतों में गिना है। द इंडियन एक्सप्रेस (The Indian Express) ने उनकी वापसी को फ्रेंचाइज़ी में नई जान फूंकने वाला बताया, और बाकी रिव्यूज़ में भी उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस और परफॉर्मेंस की तारीफ हुई।
गुड्डू पंडित के रूप में अली फज़ल
अली फज़ल (Ali Fazal) गुड्डू को ऐसे किरदार के तौर पर निभाते हैं जो बदले और महत्वाकांक्षा के बीच फंसा है। फ्रेंचाइज़ी के शुरुआती हिस्सों में गुड्डू का गुस्सा सीधा और शारीरिक दिखता था। फिल्म में उसकी स्थिति ज़्यादा उलझी हुई है, क्योंकि सत्ता के लिए आक्रामकता के साथ हिसाब-किताब भी चाहिए।
गुड्डू को पारंपरिक हीरो की तरह नहीं दिखाया गया। वह बेरहम फैसले ले सकता है, और उसके निजी लक्ष्य अक्सर आसपास के लोगों के हितों से टकराते हैं। यही नैतिक अनिश्चितता उसे बदले की आग में जलते किसी साधारण नायक से ज़्यादा दिलचस्प बनाती है।
अली फज़ल का काम तब सबसे दमदार लगता है जब गुड्डू को कुछ करने से पहले सोचना पड़ता है। किरदार की तीव्रता पहचानी हुई है, मगर ज़्यादा असरदार पल वे हैं जब वह उस उबाल को काबू में रखने की कोशिश करता है। कालीन भैया और मुन्ना के साथ उसकी बातचीत में फ्रेंचाइज़ी का पूरा भावनात्मक इतिहास झलकता है, बिना किसी लंबी व्याख्या के।
फिल्म गुड्डू के ज़रिए यह भी दिखाती है कि ताकत इंसान को कैसे बदल देती है। उसका सफर सिर्फ दुश्मनों को हराने का नहीं है। यह उस शख्स में ढल जाने का सफर है जो उसी दुनिया में टिक सके, जिससे कभी वह खुद भाग निकलना चाहता था।
मुन्ना त्रिपाठी के रूप में दिव्येंदु
दिव्येंदु (Divyenndu) की मुन्ना त्रिपाठी के रूप में वापसी फिल्म के सबसे बड़े आकर्षणों में से एक है। घमंड, असुरक्षा, मज़ाकिया अंदाज़ और अनिश्चित मिज़ाज के मेल की वजह से मुन्ना आज भी मिर्ज़ापुर यूनिवर्स का सबसे पहचाना जाने वाला चेहरा है।
उसके आते ही सीन का मूड बदल जाता है। भले वह किसी को सीधे धमका न रहा हो, दर्शक यही उम्मीद करते हैं कि उसकी भावनाएं कोई न कोई बखेड़ा खड़ा करेंगी। वह किसी भी बातचीत को झगड़े में बदल सकता है, क्योंकि जिन चुनौतियों को बाकी किरदार कारोबारी मामला मानते हैं, उन्हें वह निजी तौर पर ले लेता है।
फिल्म का ज़्यादातर डार्क ह्यूमर भी मुन्ना से ही आता है। उसके कॉमिक पल उसके इर्द-गिर्द मंडराते खतरे को कम नहीं करते, बल्कि किरदार को और अप्रत्याशित बना देते हैं। दर्शक उसकी हरकतों पर हंस सकते हैं, पर साथ ही जानते हैं कि उसका अगला कदम गंभीर नतीजे ला सकता है।
शुरुआती दर्शक प्रतिक्रियाओं में दिव्येंदु की वापसी के साथ-साथ फिल्म के एक्शन और डायलॉग्स की भी खास तारीफ हुई।
बब्बन/बबुआ यादव के रूप में रवि किशन
रवि किशन फिल्म में एक अलग ही ऊर्जा लेकर आते हैं। उनका किरदार बब्बन/बबुआ यादव मिर्ज़ापुर की स्थापित दुनिया के भीतर दबाव का एक नया आपराधिक केंद्र बनाता है।
जिन किरदारों की ताकत लंबे राजनीतिक नियंत्रण पर टिकी है, उनसे उलट बब्बन ज़्यादा सीधा और आक्रामक है। उसकी गतिविधियां खतरे की एक और परत जोड़ती हैं और पुराने खिलाड़ियों को ऐसी चुनौती का जवाब देने पर मजबूर करती हैं जिसे वे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
रवि किशन की खूबी है कि वे खौफ और नाटकीय जोश को एक साथ पिरो देते हैं। उनका किरदार पर्दे पर मज़बूती से छाया रहता है, फिर भी वह कालीन भैया या मुन्ना की नकल जैसा महसूस नहीं होता।
आधिकारिक कास्ट जानकारी में रवि किशन को बब्बन/बबुआ यादव के किरदार से जोड़ा गया है, और कहानी से जुड़ी रिपोर्ट्स उन्हें फिल्म के ड्रग्स वाले टकराव से जोड़ती हैं।

सपोर्टिंग कास्ट और बाकी किरदारों का योगदान
बड़े एन्सेम्बल में श्वेता त्रिपाठी (Shweta Tripathi), रसिका दुग्गल (Rasika Dugal), हर्षिता गौर (Harshita Gaur), श्रेया पिलगांवकर (Shreya Pilgaonkar), जितेंद्र कुमार (Jitendra Kumar) और सोनल चौहान (Sonal Chauhan) भी नज़र आते हैं। हर सहायक किरदार को बराबर विस्तार नहीं मिलता, लेकिन बेहतर पल वही हैं जहां निजी रिश्ते सीधे सत्ता की लड़ाई को प्रभावित करते हैं।
सपोर्टिंग कास्ट अहम है, क्योंकि मिर्ज़ापुर सिर्फ बंदूक थामे मर्दों की कहानी नहीं है। इसका भावनात्मक और राजनीतिक ताना-बाना परिवार, वफादारी, चालबाज़ी और आपराधिक महत्वाकांक्षा के अंजाम पर भी टिका है।
रसिका दुग्गल की मौजूदगी आक्रामक माहौल के बीच भावनात्मक विरोधाभास रचती है। श्वेता त्रिपाठी मूल सीरीज़ से निरंतरता लेकर आती हैं, जबकि बाकी कलाकार फिल्म की दुनिया को केंद्रीय रंजिश से आगे फैलाने में मदद करते हैं।
कमज़ोरी यह है कि स्क्रीनप्ले कई बार सब-प्लॉट्स के बीच इतनी तेज़ी से कूदता है कि सहायक किरदार बस अगले टकराव को आगे बढ़ाने के लिए आते दिखते हैं। कुछ रिश्तों को अगर बड़े एक्शन सीक्वेंस के बीच की कड़ी भर बनाने के बजाय ज़्यादा फोकस के साथ लिखा जाता, तो वे और निखर सकते थे।
एक्शन सीक्वेंस और हिंसा
मिर्ज़ापुर: द मूवी का एक्शन फ्रेंचाइज़ी की तय शैली पर ही चलता है। इसमें गोलीबारी, अचानक हमले, धमकियां, अपराधियों की सौदेबाज़ी और हिंसक भिड़ंत सब कुछ है। यह एक्शन किसी आम स्पाई थ्रिलर की तरह सलीकेदार या बहुत स्टाइलिश बनाने के लिए नहीं रचा गया। यह कच्चा, अचानक और किरदारों के आपराधिक माहौल से गहराई से जुड़ा है।
सबसे प्रभावी एक्शन सीन वे हैं जिनके भावनात्मक नतीजे होते हैं। जब कोई भिड़ंत धोखे, बदले या कब्ज़े की जंग से उपजती है, तब हिंसा सार्थक लगती है। दर्शक समझते हैं कि किरदार अपनी जान दांव पर लगाने को तैयार क्यों हैं।
फिल्म का क्लाइमैक्स वैसी ही तालियां बटोरने वाली ऊर्जा देता है जैसी मिर्ज़ापुर की थिएट्रिकल रिलीज़ से उम्मीद थी। इसमें फ्रेंचाइज़ी की परिचित आक्रामकता, संवादों से बना तनाव और बड़े पैमाने की प्रस्तुति एक साथ आ जाती है।
हालांकि हर एक्शन सीक्वेंस उतना कामयाब नहीं है। एक समीक्षा में अंत के पास आने वाले कार चेज़ को खासतौर पर ज़बरदस्ती ठूंसा हुआ बताया गया। यह आलोचना फिल्म की एक बड़ी दिक्कत की ओर इशारा करती है: कुछ सीन थिएटर वाला तमाशा रचने के लिए खींचे गए लगते हैं, भले कहानी को उनकी ज़रूरत न हो।
हिंसा भी इतनी तीखी है कि A सर्टिफिकेट जायज़ लगता है। सर्टिफिकेशन से जुड़ी रिपोर्ट्स के मुताबिक फाइनल वर्ज़न में वयस्क दर्शकों वाला मिज़ाज बरकरार रखा गया, अंतरंग दृश्यों में मामूली कट लगे और कुछ गालियों को म्यूट किया गया।
डायलॉग्स और डार्क ह्यूमर
संवाद अब भी इस फिल्म को देखने की सबसे मज़बूत वजहों में से हैं। मिर्ज़ापुर की पहचान हमेशा से उसकी बेबाक धमकियों, देसी बोलचाल और तीखी नोकझोंक से जुड़ी रही है। फिल्म समझती है कि उसके किरदारों को चिकने-चुपड़े कॉरपोरेट अपराधियों या घिसे-पिटे एक्शन हीरो की तरह नहीं बोलना चाहिए।
डायलॉग तब सबसे अच्छे लगते हैं जब वे सत्ता के समीकरण उजागर करते हैं। कोई धमकी तब ज़्यादा असर करती है जब दर्शक जानते हों कि उसे अंजाम देने का अधिकार किसके पास है। इसी तरह कोई तंज़ तब वज़नदार बनता है जब वह किसी पुरानी दुश्मनी या निजी असुरक्षा को उघाड़ देता है।
सबसे पहचाना हुआ डार्क ह्यूमर मुन्ना के दृश्यों में मिलता है, जबकि गुड्डू और कालीन भैया संयमित ज़ुबानी टकराव से तनाव पैदा करते हैं। फिल्म हास्य का इस्तेमाल कहानी को भावनात्मक रूप से सपाट होने से बचाने के लिए भी करती है। उन पलों के बिना लगातार चलती हिंसा थका देने वाली बन सकती थी।
फिर भी डायलॉग पर टिका यह अंदाज़ पहली बार देखने वालों से ज़्यादा पुराने फैंस को मज़ा देता है। नए दर्शक शब्द तो समझ लेंगे, लेकिन उनके पीछे छिपा इतिहास छूट सकता है। फिल्म उम्मीद करती है कि दर्शक कुछ नामों, जुमलों और प्रतिक्रियाओं का महत्व खुद पहचान लें।
म्यूज़िक और बैकग्राउंड स्कोर
संगीत फिल्म के लार्जर-दैन-लाइफ अंदाज़ को सहारा देता है। रैप ट्रैक्स और जोशीले म्यूज़िकल पल अपराध की पृष्ठभूमि में फिट बैठते हैं, वहीं बैकग्राउंड स्कोर किरदारों के चारों ओर खतरे का एहसास बनाए रखता है।
भावनात्मक विरोधाभास रचने के लिए भी संगीत का इस्तेमाल हुआ है। “वारूं (Vaaroon)” और “सांसों की माला (Saanson Ki Maala)” हिंसक कथानक के बीच एक अलग रंग भरते हैं। “सांसों की माला” अंत के करीब एक नरम म्यूज़िकल पल के रूप में खास काम आता है, जो फिल्म को कुछ देर के लिए आक्रामकता से दूर ले जाकर चिंतनशील मूड बनाता है।
म्यूज़िक फिल्म का कायापलट तो नहीं करता, लेकिन फ्रेंचाइज़ी के माहौल को और गाढ़ा कर देता है। यह सबसे बेहतर तब लगता है जब किसी किरदार की भावनात्मक हालत को रेखांकित करने के लिए आता है, न कि सिर्फ किसी बड़े एक्शन सीन का साथ देने के लिए।
इंडिया टुडे (India Today) के रिव्यू में भी फिल्म के रैप ट्रैक्स, संगीत, “वारूं” की वापसी और “सांसों की माला” के कोमल इस्तेमाल का ज़िक्र किया गया।
स्क्रीनप्ले और कहानी कहने का ढांचा
स्क्रीनप्ले में एक ठोस क्राइम ड्रामा के लिए भरपूर मसाला है। रंजिशें हैं, बदलते गठजोड़ हैं, ड्रग्स का झगड़ा है, राजनीतिक दखल है और निजी बदला भी। दिक्कत घटनाओं की कमी नहीं है। असल परेशानी यह है कि फिल्म कई बार अलग-अलग अहमियत वाली घटनाओं को एक जैसा नाटकीय वज़न दे देती है।
स्क्रीनप्ले के सबसे मज़बूत हिस्से मुख्य किरदारों के फैसलों पर टिके हैं। जब कालीन भैया, गुड्डू या मुन्ना को निजी जज़्बात और रणनीतिक फायदे में से किसी एक को चुनना होता है, कहानी बांधे रखती है।
कमज़ोर हिस्से तब आते हैं जब कथानक सत्ता के ढांचे में कोई खास बदलाव लाए बिना एक और भिड़ंत या सब-प्लॉट जोड़ देता है। कुछ दृश्य एक ही बात दोहराते हैं: एक किरदार कब्ज़ा चाहता है, दूसरा झुकने से इनकार करता है, और टकराव हिंसा की ओर बढ़ जाता है।
रनटाइम के चलते यह दोहराव और ज़्यादा खटकता है। छोटी फिल्म में कोई जाना-पहचाना टकराव फ्रेंचाइज़ी की स्टाइल का हिस्सा लग सकता था। तीन घंटे से लंबी फिल्म में वही बार-बार की भिड़ंत देरी जैसी महसूस होने लगती है।

रनटाइम और एडिटिंग
फिल्म की सबसे साफ दिखने वाली कमज़ोरी उसकी लंबाई है। करीब 3 घंटे 17 मिनट के रनटाइम के साथ मिर्ज़ापुर: द मूवी किसी आम कमर्शियल थ्रिलर से काफी लंबी है।
लंबा रनटाइम अपने-आप में कोई समस्या नहीं है। क्राइम ड्रामा को अक्सर किरदारों, राजनीतिक जाल और बदलती वफादारियों को उभारने के लिए वक्त चाहिए होता है। यहां मुद्दा यह है कि कुछ दृश्य इतनी नई जानकारी या भावनात्मक गहराई नहीं जोड़ते कि उनकी अवधि सही ठहराई जा सके।
तीन जगहों पर कसी हुई एडिटिंग से फिल्म को फायदा हो सकता था:
- बार-बार की भिड़ंत: कुछ बहसें और धमकियां वही बात बताती हैं जो दर्शक पहले ही समझ चुके होते हैं।
- सेकेंडरी सब-प्लॉट्स: कुछ सहायक कहानियों को ध्यान तो मिलता है, पर वे पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं।
- खिंचे हुए एक्शन सीक्वेंस: कुछ एक्शन पल ज़रूरत से लंबे लगते हैं, खासकर तब जब वे कहानी में कोई बड़ा मोड़ नहीं लाते।
द इंडियन एक्सप्रेस ने फिल्म को लंबी मगर मनोरंजक बताया। इंडिया टुडे ने भी स्क्रिप्ट और एडिटिंग को और कसने की ज़रूरत पर सवाल उठाए, जबकि द वीक (The Week) ने इसे फ्रेंचाइज़ी में फूली हुई लेकिन ठोस कड़ी कहा।
कुल मिलाकर फिल्म मनोरंजन तो करती है, पर धैर्य मांगती है। फ्रेंचाइज़ी के माहौल का लुत्फ उठाने वाले दर्शक इस लंबाई को स्वीकार कर लेंगे, जबकि कसे हुए थ्रिलर की तलाश में आए लोगों को दूसरा हाफ ऊबड़-खाबड़ लग सकता है।
सीरीज़ के मुकाबले फिल्म कैसी है?
मूल मिर्ज़ापुर सीरीज़ के पास समय का फायदा था। वह एपिसोड-दर-एपिसोड किरदारों के रिश्ते पनपने देती थी और धीरे-धीरे तनाव गढ़ सकती थी। फिल्म को उसी तरह की दुनिया को एक थिएट्रिकल कहानी में समेटना पड़ता है।
यह समेटना ऊर्जा भी देता है और कमज़ोरी भी। फिल्म एक टकराव से दूसरे तक तेज़ी से भागती है, लेकिन हमेशा वह गहराई नहीं दे पाती जो कई एपिसोड वाला सीज़न दे सकता है।
फिल्म काफी हद तक नॉस्टैल्जिया पर भी निर्भर है। लौटते किरदार दर्शकों से तुरंत जुड़ाव बना लेते हैं, पर पुरानी यादें कभी-कभी किरदार के विकास का विकल्प बन जाती हैं। किसी परिचित चेहरे के फ्रेम में आते ही तालियां बज सकती हैं, फिर भी उस सीन को एक मज़बूत नाटकीय मकसद चाहिए।
मिर्ज़ापुर: द मूवी तब सबसे अच्छा काम करती है जब वह फ्रेंचाइज़ी के अतीत को कहानी कहने के विकल्प के बजाय भावनात्मक पृष्ठभूमि की तरह इस्तेमाल करती है। जब किरदार पुराना बर्ताव दोहराने की जगह नए फैसले लेते हैं, तब फिल्म ज़्यादा असर छोड़ती है।
क्या नए दर्शकों के लिए यह फिल्म ठीक है?
नए दर्शक आपराधिक रंजिश की मोटी कहानी तो समझ लेंगे, लेकिन उन्हें वह भावनात्मक झटका शायद न लगे जो लंबे समय से जुड़े फैंस महसूस करते हैं।
फिल्म मानकर चलती है कि आप इन बातों से वाकिफ हैं:
- मिर्ज़ापुर के सत्ता-तंत्र में कालीन भैया की हैसियत।
- गुड्डू का निजी और आपराधिक सफर।
- सत्ता और अधिकार के साथ मुन्ना का रिश्ता।
- बड़े किरदारों के बीच का भावनात्मक अतीत।
- फ्रेंचाइज़ी में बार-बार उभरने वाले राजनीतिक और पारिवारिक झगड़े।
जिसने सीरीज़ देखी है, उसके लिए फिल्म में पहचाने चेहरे, याद रह जाने वाले संवाद और इन किरदारों को थिएटर में देखने का आनंद है। इस यूनिवर्स से बिल्कुल अनजान दर्शक को कहानी भीड़ भरी और भावनात्मक रूप से दूर लग सकती है।
पिछले सीज़न का एक छोटा-सा रीकैप फिल्म देखने से पहले पहली बार वाले दर्शकों को अहम रिश्ते समझने में मदद करेगा।
क्या मिर्ज़ापुर: द मूवी देखने लायक है? (मिर्ज़ापुर द मूवी रिव्यू का निचोड़)
मूल सीरीज़ के जो फैंस फ्रेंचाइज़ी की हिंसा, ह्यूमर और किरदारों की रंजिश का और डोज़ चाहते हैं, उनके लिए मिर्ज़ापुर: द मूवी देखने लायक है। पंकज त्रिपाठी, अली फज़ल, दिव्येंदु और रवि किशन के अभिनय में इतनी ऊर्जा है कि फिल्म बांधे रखती है।
जिन दर्शकों को राजनीतिक तनाव, नैतिक रूप से उलझे किरदार और संवादों से चलने वाली टक्कर वाले क्राइम ड्रामा पसंद हैं, उनके लिए भी यह अच्छा विकल्प है।
मगर जिन्हें कसी हुई कहानी पसंद है, उन्हें रनटाइम भारी पड़ सकता है। लंबी अवधि, भीड़ भरे सब-प्लॉट्स और कहीं-कहीं ज़बरदस्ती के एक्शन सीक्वेंस इसे पूरी तरह संतोष देने वाला थिएट्रिकल क्राइम एपिक बनने से रोकते हैं।
यह फिल्म पैमाने के मामले में पूरी तरह नाकाम भी नहीं है। इसके बेहतरीन दृश्य साबित करते हैं कि मिर्ज़ापुर यूनिवर्स बड़े पर्दे पर चल सकता है। लेकिन सबसे यादगार पल अब भी एक्शन के आकार से नहीं, किरदारों से ही निकलते हैं।
फाइनल वर्डिक्ट
मिर्ज़ापुर: द मूवी एक मनोरंजक लेकिन असमान थिएट्रिकल वापसी है। यह अपने अभिनय, जाने-पहचाने संवाद-शैली, डार्क ह्यूमर, हिंसक भिड़ंत और किरदारों की ज़बरदस्त केमिस्ट्री के दम पर कामयाब होती है।
पंकज त्रिपाठी फिल्म के सबसे संयमित कलाकार बने रहते हैं, जबकि अली फज़ल गुड्डू को महत्वाकांक्षा और अंदरूनी द्वंद्व का मिला-जुला रंग देते हैं। दिव्येंदु मुन्ना की बेलगाम ऊर्जा वापस लाते हैं, और रवि किशन बब्बन/बबुआ यादव के ज़रिए एक ताज़ा आपराधिक खतरा जोड़ते हैं।
फिल्म की मुख्य कमज़ोरी स्क्रीनप्ले में अनुशासन की कमी है। कई दृश्य छोटे किए जा सकते थे, कुछ सहायक किरदारों को ज़्यादा केंद्रित विकास चाहिए था, और कुछ एक्शन सीक्वेंस ज़रूरत से ज़्यादा भव्यता दिखाने के लिए गढ़े हुए लगते हैं।
हमारे मिर्ज़ापुर द मूवी रिव्यू का सीधा फैसला यही है: मौजूदा फैंस के लिए इसमें इतना नॉस्टैल्जिया और मनोरंजन है कि थिएटर जाकर देखना बनता है। नए दर्शकों को सीरीज़ की पृष्ठभूमि के बिना यह फिल्म भीड़ भरी लग सकती है।
रेटिंग: 3.5/5
| श्रेणी | रेटिंग |
|---|---|
| कहानी | 3.5/5 |
| अभिनय | 4/5 |
| एक्शन | 3.5/5 |
| डायलॉग्स | 4/5 |
| म्यूज़िक | 3.5/5 |
| एडिटिंग और रफ्तार | 2.5/5 |
| ओवरऑल | 3.5/5 |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
मिर्ज़ापुर: द मूवी की रिलीज़ डेट क्या है?
मिर्ज़ापुर: द मूवी 4 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई थी।
मिर्ज़ापुर: द मूवी का रनटाइम कितना है?
फिल्म की बताई गई अवधि लगभग 3 घंटे 17 मिनट है।
बब्बन/बबुआ यादव का किरदार किसने निभाया है?
फिल्म में बब्बन/बबुआ यादव का रोल रवि किशन ने निभाया है।




