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अनुराग कश्यप (Anurag Kashyap) जब भी कोई नई फिल्म लेकर आते हैं, दर्शकों को परतदार कहानी, नैतिक उलझनों वाले किरदार और मेनस्ट्रीम फॉर्मूले से हटकर चलने वाली कथा की उम्मीद रहती है। बंदर (Bandar, 2026) उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है। यह एक लीगल क्राइम ड्रामा है, जो सार्वजनिक आरोपों, मीडिया ट्रायल और उस न्याय व्यवस्था की पड़ताल करता है जो सच और धारणा के बीच फर्क करने में जूझ रही है। इस बंदर मूवी रिव्यू में हम कहानी, कलाकारों, निर्देशन और कमाई का पूरा हिसाब देंगे।
फिल्म की कमान बॉबी देओल (Bobby Deol) के हाथ में है। कहानी एक ढलते करियर वाले टीवी एक्टर की है, जिसकी ज़िंदगी एक गंभीर आरोप के बाद पूरी तरह बिखर जाती है। बंदर आम कोर्टरूम थ्रिलर के ढर्रे से आगे जाकर उस केस के भावनात्मक, कानूनी और मनोवैज्ञानिक असर को टटोलती है, जिस पर पूरे देश की नज़र टिकी है। फिल्म दर्शक से सवाल करती है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही समाज कितनी जल्दी अपनी राय बना लेता है, और सुर्खियों के पार झाँकने के लिए उकसाती है।
सान्या मल्होत्रा (Sanya Malhotra), सपना पब्बी (Sapna Pabbi), सबा आज़ाद (Saba Azad), राज बी. शेट्टी (Raj B. Shetty), इंद्रजीत सुकुमारन (Indrajith Sukumaran), रिद्धि सेन (Riddhi Sen) और जितेंद्र जोशी (Jitendra Joshi) जैसे मज़बूत सहायक कलाकारों के साथ यह एक एन्सेम्बल फिल्म बन जाती है, जहाँ हर अहम किरदार कहानी की दिशा तय करता है। फिल्म पारंपरिक कमर्शियल मनोरंजन की जगह यथार्थ, गहरी लेखनी और विश्वसनीय अभिनय को तरजीह देती है। यह अंदाज़ हर किसी को भाए, ज़रूरी नहीं, पर इसी वजह से आज के हिंदी सिनेमा में इसकी अपनी अलग पहचान बनती है।
अगर आपको कोर्टरूम ड्रामा पसंद हैं या ऐसी फिल्में अच्छी लगती हैं जिन पर क्रेडिट्स खत्म होने के बाद भी चर्चा चलती रहे, तो बंदर एक सोचने पर मजबूर करने वाला सिनेमाई अनुभव है, जो बॉलीवुड के रूटीन थ्रिलरों से साफ अलग खड़ा दिखता है।
बंदर फिल्म: एक नज़र में (Movie Snapshot)
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| फिल्म का नाम | बंदर (Bandar) |
| रिलीज़ डेट | 5 जून 2026 |
| जॉनर | क्राइम, थ्रिलर |
| भाषा | हिंदी |
| रनटाइम | 2 घंटे 16 मिनट (136 मिनट) |
| CBFC रेटिंग | A (केवल वयस्कों के लिए) |
| निर्देशक | अनुराग कश्यप |
| निर्माता | निखिल द्विवेदी (Nikhil Dwivedi) |
| मुख्य कलाकार | बॉबी देओल, सान्या मल्होत्रा, सपना पब्बी, सबा आज़ाद, राज बी. शेट्टी, इंद्रजीत सुकुमारन, रिद्धि सेन, जितेंद्र जोशी |
| स्क्रीनप्ले | सुदीप शर्मा (Sudip Sharma), अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) |
| प्रोडक्शन | सैफ्रन मैजिकवर्क्स (Saffron Magicworks), निखिल द्विवेदी प्रोडक्शन |
| डिस्ट्रीब्यूटर | ज़ी स्टूडियोज़ (Zee Studios) |
| रिलीज़ फॉर्मेट | सिनेमाघर (थिएट्रिकल) |
| स्रोत | IMDb • ऑफिशियल ट्रेलर • ज़ी स्टूडियोज़ • Sacnilk |
| स्ट्रीमिंग / OTT | फिलहाल स्ट्रीमिंग पर उपलब्ध नहीं (आधिकारिक OTT रिलीज़ की घोषणा अभी नहीं हुई) |
बंदर देखने से पहले क्या जानें
अगर आप तेज़ रफ्तार, एक्शन से भरपूर, हर मोड़ पर ट्विस्ट और हीरो वाले जोशीले कोर्टरूम भाषणों की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो बंदर आपको चौंका सकती है। फिल्म कहीं ज़्यादा ज़मीनी शैली अपनाती है और अपने किरदारों व कानूनी टकराव को धीरे-धीरे पनपने देती है।
कहानी एक संवेदनशील विषय के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो साख, रिश्तों, मीडिया के असर और उस बोझ को परखती है जब जनता पहले ही फैसला सुना चुकी हो और आपको अपनी बेगुनाही साबित करनी पड़े। पटकथा कई नज़रियों को सामने रखती है और दर्शकों को किसी एक व्याख्या की ओर धकेलने के बजाय खुद नतीजे तक पहुँचने की छूट देती है।
कहानी कहने का यह नपा-तुला तरीका धैर्य माँगता है, मगर इसी से भावुक पल ज़्यादा सच्चे लगते हैं। बड़े नाटकीय मोड़ों तक पहुँचने से पहले फिल्म अपने किरदारों को इत्मीनान से गढ़ती है, इसलिए हर अहम बातचीत में वज़न महसूस होता है।
बंदर मूवी रिव्यू: कहानी (बिना स्पॉइलर)
कहानी समर की है, एक उम्रदराज़ होते टीवी एक्टर, जिसका करियर पहले से ही ढलान पर है। जब वह निजी ज़िंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश करता है, तभी उसकी पूर्व पार्टनर गायत्री का एक अप्रत्याशित आरोप उसका पूरा भविष्य पलट देता है। यह आरोप देखते ही देखते हेडलाइन बन जाता है और एक बेहद निजी मामला राष्ट्रीय बहस में तब्दील हो जाता है।
जल्द ही समर एक ऐसी कानूनी लड़ाई में फँस जाता है, जिसमें अदालत की कार्यवाही संघर्ष का सिर्फ एक हिस्सा है। जाँच किसी ठोस नतीजे पर पहुँचे, उससे बहुत पहले ही टीवी डिबेट, सोशल मीडिया की चर्चाएँ और अटकलें लोगों की राय गढ़ने लगती हैं। हर नया घटनाक्रम उसके रिश्तों, करियर और मानसिक संतुलन पर चोट करता है।
स्क्रीनप्ले अपने सबसे बड़े जवाब तुरंत नहीं खोलता। पुलिस जाँच, अदालती सुनवाई, निजी बातचीत और आपस में टकराती गवाहियों के ज़रिए परतें धीरे-धीरे खुलती हैं। हर अध्याय सस्पेंस को कम किए बिना नया संदर्भ जोड़ता है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह अपने किरदारों को सीधे-सादे हीरो या विलेन में नहीं बाँटती। हर प्रमुख किरदार के पास समझ में आने वाली वजहें, अंदरूनी द्वंद्व और इंसानी कमज़ोरियाँ हैं, जो कहानी को प्रभावित करती हैं। नतीजा यह कि कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते दर्शक बार-बार अपनी राय पर दोबारा सोचते हैं। बड़े ट्विस्ट बताए बिना इतना कहा जा सकता है कि बंदर गैरज़रूरी सनसनी से बचते हुए कानूनी जंग के इंसानी नतीजों पर फोकस बनाए रखती है।

बंदर बाकी लीगल थ्रिलर से अलग क्यों लगती है
भारतीय सिनेमा में लीगल थ्रिलर कम नहीं हैं, लेकिन उनमें से कई फिल्में ज़ोरदार कोर्टरूम भाषणों, ऐन मौके पर मिलने वाले सबूतों और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई भिड़ंतों पर टिकी होती हैं। बंदर इसके उलट शांत और यथार्थवादी रास्ता चुनती है।
अदालत के दृश्य संयमित और भरोसेमंद लगते हैं। दलीलें स्वाभाविक ढंग से आगे बढ़ती हैं, कानूनी प्रक्रियाओं पर पूरा ध्यान दिया गया है और कई बार तनाव ऊँची आवाज़ों से नहीं, खामोशी से पैदा होता है। यही यथार्थ ड्रामे को और दिलचस्प बनाता है, क्योंकि हर फैसला असली इंसानी बर्ताव से जुड़ा महसूस होता है।
एक और खास पहलू है मीडिया के असर का चित्रण। न्यूज़ चैनल, ऑनलाइन बहसें और जनता की प्रतिक्रियाएँ ऐसी ताकतें बन जाती हैं जो इससे जुड़े हर शख्स की ज़िंदगी को आकार देती हैं। स्क्रीनप्ले दिखाता है कि साख कुछ ही घंटों में कैसे ढह सकती है, और याद दिलाता है कि जनता की धारणा अक्सर न्याय व्यवस्था से कहीं ज़्यादा तेज़ दौड़ती है।
विज़ुअल स्तर पर अनुराग कश्यप बेवजह की चमक-दमक से दूर रहते हैं। शहरी लोकेशन, अदालतें, थाने और घरों को असलियत के साथ पेश किया गया है, जिससे दर्शक स्टाइलिश फिल्ममेकिंग में भटकने के बजाय कहानी में डूबे रहते हैं।
जहाँ कई कमर्शियल थ्रिलर लगातार चौंकाने पर निर्भर रहते हैं, वहीं बंदर विश्वसनीय लेखन, परतदार अभिनय और भावनात्मक ईमानदारी से दर्शकों को बाँधे रखती है। यही रचनात्मक चुनाव इसे हाल के वर्षों में आई ज़्यादा परिपक्व हिंदी क्राइम ड्रामा फिल्मों में शामिल करता है।
बंदर फिल्म कास्ट और एक्टिंग
बंदर के लंबे समय तक याद रहने की सबसे बड़ी वजह इसके कलाकारों का काम है। चूँकि कहानी कमर्शियल एक्शन से ज़्यादा भावनात्मक टकराव पर टिकी है, इसलिए हर एक्टर को सिर्फ प्लॉट आगे खिसकाने के बजाय अपने किरदार को विश्वसनीय ढंग से गढ़ने की पूरी जगह मिली है।
समर के रोल में बॉबी देओल
समर के किरदार में बॉबी देओल ने अपने हालिया करियर की सबसे असरदार परफॉर्मेंस में से एक दी है। वे एक ऐसे इंसान को निभाते हैं जिसकी निजी और पेशेवर ज़िंदगी जनता की पैनी नज़र और चल रही कानूनी लड़ाई के बीच धीरे-धीरे बदलती जाती है। नाटकीय भावनात्मक उछाल के बजाय वे किरदार को कहानी के साथ सहज रूप से विकसित होने देते हैं। जाँच के हर पड़ाव के साथ उसका आत्मविश्वास, असमंजस और बढ़ता मानसिक बोझ ज़्यादा साफ दिखने लगता है, जिससे समर का सफर सच्चा लगता है।
सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है उनके अभिनय की निरंतरता। हर बातचीत में किरदार के आसपास बढ़ता दबाव झलकता है, पर कहीं भी ओवरएक्टिंग नहीं लगती। इसी संतुलित अंदाज़ की बदौलत दर्शक समर की तकलीफों से जुड़ पाते हैं, और उसका बदलाव फिल्म के सबसे मज़बूत भावनात्मक पहलुओं में गिना जाता है।
सान्या मल्होत्रा
सान्या मल्होत्रा ने एक बार फिर दिखाया है कि उन्हें हिंदी सिनेमा की सबसे भरोसेमंद अदाकाराओं में क्यों गिना जाता है। उनका किरदार कहानी में भावनात्मक संतुलन लाता है और एक-आयामी सपोर्टिंग रोल बनकर नहीं रह जाता। भावनाओं से भरे कई दृश्यों को वे गज़ब की परिपक्वता से संभालती हैं और ड्रामा को ज़रूरत से ज़्यादा खींचे बिना उसमें सच्चाई भर देती हैं।
सपना पब्बी
सपना पब्बी फिल्म के सबसे अहम किरदारों में से एक निभाती हैं। पूरा कानूनी विवाद उन्हीं के आरोप के इर्द-गिर्द घूमता है, इसलिए उनका अभिनय विश्वसनीय और भावनात्मक रूप से ज़मीन से जुड़ा होना ज़रूरी था। वे नाज़ुकपन, आत्मविश्वास, अनिश्चितता और अंदरूनी कशमकश को इस तरह पेश करती हैं कि किरदार न तो पूरी तरह सही दिखता है और न पूरी तरह गलत, और इसी में उनकी कामयाबी है।
सहायक कलाकार
राज बी. शेट्टी, इंद्रजीत सुकुमारन, सबा आज़ाद, रिद्धि सेन और जितेंद्र जोशी, सभी ने सार्थक योगदान दिया है। इनमें से कोई भी सिर्फ स्क्रीन टाइम भरने के लिए मौजूद नहीं है। हर सहायक किरदार समर के सफर पर असर डालता है, जिससे कहानी और समृद्ध तथा भरोसेमंद बनती है।
कुल मिलाकर कास्टिंग सोच-समझकर की गई लगती है, और हर कलाकार फिल्म के यथार्थवादी मिज़ाज में स्वाभाविक रूप से घुल-मिल जाता है।
अनुराग कश्यप का निर्देशन
अनुराग कश्यप ऐसी कहानियाँ गढ़ने के लिए जाने जाते हैं जो दर्शकों को चुनौती देती हैं और आसान जवाब नहीं थमातीं। बंदर उनके इसी फिल्मी दर्शन को आगे बढ़ाते हुए आज के सबसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दों में से एक को टटोलती है।
पूरी फिल्म में उनका निर्देशन संयमित रहता है। बातचीत, अदालती कार्यवाही और किरदारों के आपसी रिश्ते ही ज़्यादातर भावनात्मक तनाव रचते हैं, जबकि बैकग्राउंड म्यूज़िक का इस्तेमाल सिर्फ ज़रूरत पड़ने पर होता है।
शुरुआती एक घंटे में रफ्तार जानबूझकर धीमी रखी गई है, ताकि कानूनी टकराव तेज़ होने से पहले दर्शक हर अहम रिश्ते को समझ सकें। आगे चलकर यह धैर्य रंग लाता है, क्योंकि भावनात्मक नतीजे असली और कमाए हुए महसूस होते हैं।
कश्यप के निर्देशन की एक और खूबी है संतुलन। फिल्म कोई एक अंतिम नज़रिया थोपने से बचती है और दर्शकों को घटनाओं की अपनी व्याख्या करने देती है। यही तटस्थता आखिरी हिस्से तक दिलचस्पी बनाए रखती है और फिल्म खत्म होने के काफी बाद तक चर्चा को हवा देती है।
कमर्शियल थ्रिलर की उम्मीद रखने वालों को यह धीमी चाल शायद न जमे, लेकिन फिल्म के यथार्थवादी लहजे के साथ यह बिल्कुल फिट बैठती है।
धैर्य रखने वाले दर्शकों को फिल्म इनाम भी देती है। इसका धीमा पहला हाफ कोर्टरूम संघर्ष की भावनात्मक नींव रखता है, जिससे बाद के घटनाक्रम अचानक आए ट्विस्ट के सहारे नहीं, बल्कि अपने आप में मायने रखते हुए असर छोड़ते हैं।

स्क्रीनप्ले, सिनेमैटोग्राफी और म्यूज़िक
बंदर की एक बड़ी ताकत है सुदीप शर्मा और अभिषेक बनर्जी का सधा हुआ स्क्रीनप्ले। स्क्रिप्ट लगातार ट्विस्ट पर निर्भर रहने के बजाय धीरे-धीरे खुलते राज़, अर्थपूर्ण बातचीत और सही रफ्तार से आगे बढ़ते अदालती घटनाक्रम के ज़रिए सस्पेंस रचती है। हर सीक्वेंस बड़ी कहानी में योगदान देता है और किरदारों को सहज रूप से निखरने का मौका भी देता है।
फिल्म की विज़ुअल पहचान सैयद शाज़ रिज़वी (Saiyed Shaaz Rizvi) ने गढ़ी है, जिनकी सिनेमैटोग्राफी कहानी के ज़मीनी मिज़ाज से मेल खाती है। भड़कीले कैमरा वर्क या ओवर-द-टॉप विज़ुअल इफेक्ट्स के बजाय फिल्म असली लोकेशन, संयमित फ्रेमिंग और हल्के रंगों को अपनाती है। यह सादगी दर्शकों का ध्यान परदे पर चल रहे जज़्बात और कानूनी संघर्ष पर टिकाए रखती है।
शिवहरि वर्मा (Shivahari Varma) का बैकग्राउंड स्कोर कहानी को बारीकी से सहारा देता है। संगीत कभी भी अभिनय या कोर्टरूम ड्रामा पर हावी नहीं होता, बल्कि चुपचाप अहम भावनात्मक पलों को गहरा करता है। कई दृश्यों में खामोशी और आसपास की आवाज़ें स्कोर जितनी ही असरदार साबित होती हैं, जिससे पैदा हुआ तनाव थोपा हुआ नहीं, सच्चा लगता है। स्क्रीनप्ले, सिनेमैटोग्राफी और संगीत मिलकर फिल्म के गंभीर और यथार्थवादी माहौल को मज़बूती देते हैं।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी नज़रिए से बंदर शुरू से आखिर तक प्रभावित करती है।
लंबे रनटाइम के बावजूद एडिटिंग कहानी को भटकने नहीं देती। सीन ट्रांज़िशन सहज हैं, और कोर्टरूम सीक्वेंस बिना दोहराव के अपनी स्पष्टता बनाए रखते हैं।
प्रोडक्शन डिज़ाइन भी तारीफ का हकदार है। वकीलों के दफ्तर हों, टीवी स्टूडियो, थाने या रिहायशी जगहें, हर माहौल जिया-जिया और असली लगता है। कॉस्ट्यूम डिज़ाइन हर किरदार की सामाजिक पृष्ठभूमि और पेशे को दर्शाता है, वह भी बेवजह ध्यान खींचे बिना।
साउंड डिज़ाइन खामोशी से माहौल को मज़बूत करता है। रोज़मर्रा की आवाज़ें, जैसे अदालत की हलचल, न्यूज़रूम की बहसें, ट्रैफिक का शोर और सन्नाटा, पूरी फिल्म में यथार्थ का एहसास जोड़ती हैं।
क्या अच्छा है
- बॉबी देओल का परिपक्व और भावनात्मक रूप से विश्वसनीय अभिनय।
- अनुराग कश्यप का संयमित निर्देशन, जो फिल्म के यथार्थ को और गहरा करता है।
- दमदार पटकथा, जो सनसनीखेज़ ट्विस्ट से ज़्यादा किरदारों के विकास को अहमियत देती है।
- असली लगने वाला कोर्टरूम माहौल और भरोसेमंद संवाद।
- सहायक कलाकारों का कहानी में सार्थक योगदान।
- मीडिया के असर, जनमत और न्याय से जुड़े प्रासंगिक सामाजिक विषय।
- बेहतरीन प्रोडक्शन डिज़ाइन और सधी हुई सिनेमैटोग्राफी।
कहाँ कमी रह गई
कलात्मक तौर पर बंदर भले कामयाब हो, पर यह खामियों से पूरी तरह मुक्त नहीं है।
पारंपरिक क्राइम थ्रिलर की उम्मीद रखने वाले दर्शकों के सब्र की परीक्षा इसकी धीमी रफ्तार ले सकती है। कुछ अदालती बातचीत ज़रूरत से ज़्यादा लंबी खिंचती हैं, जिससे सेकंड हाफ में लय थोड़ी ढीली पड़ती है।
कुछ सहायक किरदारों को थोड़ा और स्क्रीन टाइम मिलता तो उनका भावनात्मक सफर और उभरकर आता। कुछ कानूनी प्रक्रियाएँ सिनेमाई ज़रूरत के हिसाब से सरल कर दी गई हैं, हालाँकि इससे फिल्म की विश्वसनीयता पर कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता।
चूँकि फिल्म जानबूझकर व्याख्या की गुंजाइश छोड़ती है, इसलिए जो दर्शक पूरी तरह सुलझा हुआ अंत पसंद करते हैं, उन्हें इसका क्लाइमैक्स मेनस्ट्रीम कोर्टरूम ड्रामा की तुलना में कम संतोषजनक लग सकता है।
बंदर बॉक्स ऑफिस कलेक्शन
भारतीय बॉक्स ऑफिस पर बंदर की शुरुआत औसत से कमज़ोर रही। ट्रेड अनुमानों के मुताबिक फिल्म ने पहले दिन ₹0.55 करोड़ कमाए, इसके बाद दूसरे दिन ₹0.88 करोड़ और तीसरे दिन ₹0.89 करोड़ का कलेक्शन किया। इस तरह पहले वीकेंड का कुल आँकड़ा लगभग ₹2.32 करोड़ रहा।
पहला हफ्ता पूरा होने तक फिल्म का अनुमानित इंडिया नेट कलेक्शन ₹3.61 करोड़ था। थिएट्रिकल रन आगे बढ़ने के साथ लाइफटाइम कमाई करीब ₹4.22 करोड़ (इंडिया नेट), ₹4.98 करोड़ (इंडिया ग्रॉस) और ₹5.45 करोड़ वर्ल्डवाइड ग्रॉस तक पहुँची, जिसमें लगभग ₹0.47 करोड़ की ओवरसीज़ कमाई भी शामिल है।
कमर्शियल प्रदर्शन उम्मीदों से नीचे रहा और ट्रेड ट्रैकर्स ने इसे बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप करार दिया। इसके बावजूद संयमित कहानी, यथार्थवादी अभिनय और सामाजिक रूप से प्रासंगिक विषयों के लिए कई समीक्षकों और दर्शकों ने बंदर की सराहना की।
फाइनल वर्डिक्ट: क्या आपको बंदर देखनी चाहिए?
बंदर कोई मामूली कोर्टरूम थ्रिलर नहीं है। यह सलीके से लिखी गई कैरेक्टर स्टडी है, जो दिखाती है कि आरोप, मीडिया की सुर्खियाँ और जनमत, न्याय के किसी नतीजे पर पहुँचने से बहुत पहले ही ज़िंदगियाँ कैसे बदल डालते हैं।
बॉबी देओल ने अपने करियर के बेहतरीन अभिनयों में से एक दिया है, जबकि अनुराग कश्यप ने फिर साबित किया है कि वे पेचीदा सामाजिक मुद्दों को दमदार सिनेमा में ढालना जानते हैं। धैर्य रखने वाले दर्शकों को स्क्रीनप्ले विचारशील कहानी, विश्वसनीय अभिनय और भावनात्मक रूप से संतोष देने वाले किरदार-सफर का तोहफा देता है।
हमारे बंदर मूवी रिव्यू का निचोड़ यह है कि सोची-समझी धीमी रफ्तार भले सबको पसंद न आए, लेकिन यथार्थवादी क्राइम ड्रामा के शौकीनों को बंदर गहराई से बाँध लेगी।
बंदर देखने के बाद मेरे ज़हन में कोई एक नाटकीय सीन नहीं, बल्कि वे सवाल ठहरे रहे जो फिल्म सच, जनता की धारणा और इंसाफ को लेकर उठाती है। अगर आप ऐसी क्राइम ड्रामा ढूँढ रहे हैं जो तमाशे से ज़्यादा कंटेंट को अहमियत दे और देर तक भावनात्मक असर छोड़े, तो बंदर आपकी वॉचलिस्ट में जगह पाने की हकदार है।
ओवरऑल रेटिंग: ★★★★☆ (4.2/5)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या बंदर सच्ची घटना पर आधारित है?
फिल्म असल ज़िंदगी के सामाजिक और कानूनी मुद्दों से प्रेरित विषयों को छूती है, लेकिन किसी एक पुष्ट घटना को दोबारा दिखाने के बजाय एक काल्पनिक कहानी पेश करती है।
बंदर में लीड रोल किसने निभाया है?
बॉबी देओल समर की मुख्य भूमिका में हैं। उनके साथ सान्या मल्होत्रा, सपना पब्बी, सबा आज़ाद, राज बी. शेट्टी, इंद्रजीत सुकुमारन, रिद्धि सेन और जितेंद्र जोशी नज़र आते हैं।
बंदर फिल्म के निर्देशक कौन हैं?
इस फिल्म का निर्देशन चर्चित फिल्मकार अनुराग कश्यप ने किया है।
बंदर का रनटाइम कितना है?
फिल्म की लंबाई 136 मिनट (2 घंटे 16 मिनट) है।
क्या बंदर देखने लायक है?
हाँ। अगर आपको यथार्थवादी लीगल ड्रामा, दमदार अभिनय और विचारोत्तेजक कहानियाँ पसंद हैं, तो बंदर ज़रूर देखनी चाहिए।
बंदर को CBFC से कौन सा सर्टिफिकेट मिला है?
फिल्म को A (केवल वयस्कों के लिए) सर्टिफिकेट मिला है।
बंदर किस जॉनर की फिल्म है?
बंदर एक हिंदी क्राइम थ्रिलर है, जिसमें लीगल ड्रामा और मनोवैज्ञानिक तत्वों की मज़बूत मौजूदगी है।




