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द वान रिव्यू: सिद्धार्थ-तमन्ना की लोककथा थ्रिलर में कितना दम?

द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया वन देवी की लोककथा से जुड़े एक वर्जित जंगल के रहस्य में उलझते हैं। पढ़ें कहानी, अभिनय, कमियां और OTT अपडेट पर हमारा पूरा रिव्यू।

इस लेख में15 sections
  1. द वान की कहानी: ऋषि गांव क्यों लौटता है?
  2. ऋषि और ममता: कहानी का निजी पहलू
  3. वन देवी की किंवदंती
  4. ऋषि के रोल में सिद्धार्थ मल्होत्रा का परफॉर्मेंस
  5. ममता के किरदार में तमन्ना भाटिया
  6. सपोर्टिंग कास्ट
  7. द वान में क्या अच्छा है?
  8. द वान कहां कमज़ोर पड़ती है
  9. निर्देशन और स्क्रीनप्ले
  10. क्या द वान एक हॉरर फिल्म है?
  11. द वान रिलीज़ डेट और रनटाइम
  12. द वान OTT रिलीज़: ऑनलाइन कहां देख सकते हैं?
  13. द वान स्टार कास्ट और क्रू
  14. फाइनल वर्डिक्ट: द वान रिव्यू
  15. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

यह लेख अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध है — Read this article in English

द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट (The Vvaan: Force of the Forrest) बॉलीवुड की एक जानी-पहचानी थीम उठाती है, यानी अपनी जड़ों की ओर लौटता एक आदमी, लेकिन उसे लोककथा पर टिकी एक सुपरनैचुरल कहानी के भीतर रख देती है। इस द वान रिव्यू में हम देखेंगे कि सिद्धार्थ मल्होत्रा (Sidharth Malhotra) और तमन्ना भाटिया (Tamannaah Bhatia) स्टारर यह फिल्म गांव की ज़िंदगी, एक पुरानी किंवदंती, पारिवारिक अतीत और उस जंगल के बीच कैसे आगे बढ़ती है, जिसमें सूरज ढलने के बाद कदम रखना स्थानीय लोगों की नज़र में बिल्कुल मना है।

फिल्म का निर्देशन दीपक कुमार मिश्रा (Deepak Kumar Mishra) ने किया है और द वान 25 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। फैंटेसी-थ्रिलर की नींव वन देवी (Van Devi) की लोककथा पर रखी गई है, जबकि ऋषि का निजी द्वंद्व इस अलौकिक कहानी को एक इंसानी शुरुआत देता है।

द वान की कहानी: ऋषि गांव क्यों लौटता है?

कहानी ऋषि की है, जो मुंबई में रहने वाला एक सिविल इंजीनियर है। उसके साथ उसकी पत्नी ममता है, जिसका किरदार तमन्ना भाटिया ने निभाया है।

अतीत की एक दर्दनाक घटना के चलते ऋषि सालों से अपने पुश्तैनी गांव देवांचल (Devanchal) से दूर रहा है। आखिरकार वह एक व्यावहारिक वजह से वापस आता है: उसे विरासत में मिली ज़मीन का निपटारा करके उसे बेचना है।

मामला तब उलझ जाता है, जब पास के जंगल को लेकर गांववालों की आस्था सामने आती है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार यह जंगल वन देवी से जुड़ा है और सूर्यास्त के बाद उस उपवन में जाना वर्जित माना जाता है। ऋषि खुद को तर्क पर चलने वाला इंसान बताता है और ऐसी अलौकिक बातों पर भरोसा नहीं करता, इसलिए वह जंगल को गांववालों की नज़र से नहीं देखता।

उसके लिए यह ज़मीन डेवलप करने लायक एक प्रॉपर्टी है। गांववालों के लिए यह एक पवित्र धरोहर है, जिसकी हिफ़ाज़त ज़रूरी है।

नज़रिए का यही फ़र्क फिल्म के मुख्य टकराव की बुनियाद बनता है।

चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करके जब ऋषि उस वर्जित जंगल में घुसता है, तो ज़मीन और आस्था का झगड़ा एक अलौकिक मुठभेड़ में बदल जाता है। इसके बाद फिल्म ऋषि के अनुभव के ज़रिए यह सवाल उठाती है कि क्या हर चीज़ को सिर्फ़ तर्क से समझाया जा सकता है।

ऋषि और ममता: कहानी का निजी पहलू

ऋषि और ममता का रिश्ता फिल्म में महज़ एक रोमांटिक ट्रैक की तरह नहीं जोड़ा गया है।

ममता ऋषि की पत्नी है और पेशे से स्कूल टीचर है। दोनों का साझा अतीत ही उस वजह से जुड़ा है, जिसके कारण ऋषि अपने गृहनगर से कटा रहा। यही रिश्ता अलौकिक कथानक में एक निजी दांव जोड़ देता है।

यह बात इसलिए अहम है क्योंकि ऋषि देवांचल किसी पुरानी यादों वाले सुकून के साथ नहीं लौट रहा। वह अपने साथ अनसुलझा बोझ लेकर आया है और ऐसा काम निपटाना चाहता है जो शुरू में बिल्कुल सीधा-सादा लगता है।

इस वजह से ममता हीरो के आसपास मौजूद कोई सहायक किरदार भर नहीं रहती, बल्कि ऋषि के भावनात्मक सफ़र का हिस्सा बन जाती है।

तमन्ना भाटिया का अभिनय फिल्म को ऋषि के शक्की मिज़ाज से अलग एक ऊर्जा देता है। पिंकविला (Pinkvilla) ने ख़ास तौर पर सिद्धार्थ और तमन्ना की केमिस्ट्री को फिल्म की खूबियों में गिना है।

वन देवी की किंवदंती

वन देवी से जुड़ी लोककथा ही द वान की नींव है।

फिल्म पहले इस किंवदंती को स्थापित करती है और फिर ऋषि की आज की कहानी पर आती है। इस ढांचे से साफ़ हो जाता है कि ऋषि के इस मामले में उतरने से बहुत पहले से यह जंगल देवांचल के लोगों के लिए क्यों मायने रखता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि जंगल को सिर्फ़ ऐसी जगह के रूप में नहीं दिखाया गया जहां अजीब घटनाएं होती हैं। वह समुदाय की मान्यताओं, गांव के इतिहास और ज़मीन के भविष्य को लेकर चल रहे विवाद से गहराई से जुड़ा है।

फिल्म की पहचान यहीं से बनती है।

अपनी रहस्यमयी कहानी को किसी गुमनाम भूतिया हवेली या शहरी लोकेशन में रखने के बजाय द वान एक ग्रामीण आस्था-तंत्र के इर्द-गिर्द अपना रहस्य बुनती है। इससे फिल्म को एक ठेठ भारतीय लोककथा वाला माहौल मिलता है।

साथ ही, फिल्म में दिखाई गई किंवदंती को उसकी काल्पनिक कहानी का हिस्सा ही समझना चाहिए। असली परंपराओं या धार्मिक विचारों के ज़िक्र को इस बात का सबूत नहीं माना जाना चाहिए कि परदे पर दिखी अलौकिक घटनाएं सचमुच घटी थीं।

ऋषि के रोल में सिद्धार्थ मल्होत्रा का परफॉर्मेंस

फिल्म का ज़्यादातर भार सिद्धार्थ मल्होत्रा के कंधों पर है, क्योंकि दर्शक इस अलौकिक रहस्य को काफ़ी हद तक ऋषि की आंखों से ही देखते हैं।

कहानी के शुरुआती हिस्से में यह किरदार सबसे असरदार लगता है, जब उसका संदेह गांववालों की श्रद्धा के सामने साफ़ विरोधाभास खड़ा करता है। जंगल को लेकर दी गई चेतावनियां वह तुरंत नहीं मानता, इसलिए उसमें घुसने का उसका फ़ैसला उसके स्वभाव से मेल खाता है।

असली चुनौती तब आती है, जब कहानी पर अलौकिक पक्ष हावी हो जाता है। उस मोड़ पर ऋषि को किंवदंती पर सवाल उठाने से आगे बढ़कर उसके नतीजों से जूझना पड़ता है।

यह बदलाव सिद्धार्थ को एक सीधे-सपाट एक्शन हीरो से अलग तरह की भूमिका देता है। जंगल के भीतर ऋषि की शारीरिक यात्रा उसके किरदार का केवल एक हिस्सा है; बड़ा परिवर्तन यह है कि जिस जगह को वह कभी सिर्फ़ पुश्तैनी संपत्ति मानता था, उसके बारे में उसकी समझ धीरे-धीरे बदलने लगती है।

द वान रिव्यू: पहाड़ों और झरनों से घिरा प्राचीन वन मंदिर
पहाड़ों और झरनों के बीच बना प्राचीन वन मंदिर, जो द वान की रहस्यमयी दुनिया की झलक देता है।

ममता के किरदार में तमन्ना भाटिया

तमन्ना भाटिया ने ममता का किरदार निभाया है, जो ऋषि की पत्नी और एक स्कूल शिक्षिका है।

उनका किरदार ऋषि के संशय के मुकाबले कहानी को भावनात्मक संतुलन देता है। ममता ऋषि के बीते कल से भी जुड़ी है और देवांचल लौटने के फ़ैसले के निजी परिणामों से भी।

पौराणिकता और अलौकिक एक्शन से भरी फिल्म में यह किरदार आसानी से हाशिये पर जा सकता था, लेकिन ऋषि के साथ उसका जुड़ाव इस रिश्ते को कथानक के लिए सचमुच प्रासंगिक बना देता है।

ममता का सबसे अच्छा इस्तेमाल तब होता है, जब पति-पत्नी का निजी इतिहास बड़े रहस्य से टकराता है। उनका रिश्ता दर्शकों को जंगल के भीतर छिपे सच के अलावा भी परवाह करने की एक वजह देता है।

सपोर्टिंग कास्ट

फिल्म में अनूप सोनी (Anup Soni), सुनील ग्रोवर (Sunil Grover), श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari), मनीष पॉल (Maniesh Paul) और दुर्गेश कुमार (Durgesh Kumar) समेत कई कलाकार नज़र आते हैं।

अनूप सोनी शशि भैया बने हैं, जबकि श्वेता तिवारी को सुशीला के रूप में क्रेडिट दिया गया है। सुनील ग्रोवर दीपक के किरदार में हैं, मनीष पॉल वीपी बनकर दिखते हैं और दुर्गेश कुमार एक पत्रकार की भूमिका में हैं।

ये सहायक कलाकार केवल जाने-पहचाने चेहरों की सूची भर नहीं हैं, बल्कि ऋषि के आसपास की सामाजिक दुनिया गढ़ने में मदद करते हैं। उनके किरदार उस ग्रामीण माहौल के अलग-अलग पहलुओं को दर्शाते हैं, जिसमें यह संघर्ष पनपता है।

द वान में क्या अच्छा है?

फिल्म की सबसे बड़ी ताक़त इसका प्रीमाइस यानी मूल विचार है।

विरासत में मिली ज़मीन का विवाद ऋषि को घर लौटने का एक विश्वसनीय कारण देता है, वहीं वन देवी की किंवदंती अलौकिक परत जोड़ती है। ये दोनों धागे आपस में गुंथे हुए हैं, अलग-अलग कहानियों की तरह नहीं चलते।

जंगल फिल्म को एक दमदार विज़ुअल सेटिंग भी देता है। इसकी बदौलत फिल्ममेकर्स पारंपरिक हॉरर तरकीबों पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना अनिश्चितता का माहौल रच पाते हैं।

एक और अच्छी बात यह है कि दर्शकों को ऋषि के साथ रहस्य में ले जाने से पहले फिल्म अपनी लोककथा का परिचय देती है। इसी वजह से आगे की घटनाओं को एक संदर्भ मिलता है और अलौकिक तत्व अचानक, बिना किसी व्याख्या के टपकते हुए नहीं लगते।

कई समीक्षाओं में फिल्म की लोककथा और विज़ुअल प्रस्तुति की तारीफ़ हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया (Times of India) ने इन पहलुओं को सराहा, हालांकि यह भी कहा कि लेखन में एकरूपता की कमी है।

द वान कहां कमज़ोर पड़ती है

फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसका एक्ज़ीक्यूशन है।

प्रीमाइस में एक कसे हुए सुपरनैचुरल थ्रिलर लायक पूरा मसाला है, मगर फिल्म एक साथ कई अलग-अलग टोन और विचारों को समेटने की कोशिश करती है। रोमांस, कॉमेडी, एक्शन, पौराणिकता और अलौकिक ड्रामा, सब जगह पाने के लिए आपस में होड़ करते दिखते हैं।

नतीजा यह कि कहानी की रफ़्तार उतनी सधी हुई नहीं रहती, जितनी उसके आइडिया से उम्मीद बंधती है।

पहले हाफ़ को जंगल के रहस्य और ऋषि के अविश्वास का फ़ायदा मिलता है। लेकिन जैसे ही फिल्म अपने अलौकिक पत्ते ज़्यादा खोलने लगती है, कहानी पर पकड़ ढीली पड़ जाती है। यहीं पर कुछ समीक्षकों को स्क्रीनप्ले असमान लगा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे असमान लेखन से प्रभावित एक संभावनाओं भरी लोककथा बताया, जबकि पिंकविला ने शुरुआती सेटअप की प्रशंसा की लेकिन सेकंड हाफ़ का निर्वाह कमज़ोर पाया।

यह आलोचना काम की है, क्योंकि यह फिल्म को सीधे “अच्छी” या “बुरी” कहने के बजाय एक ठोस दिक्कत की ओर इशारा करती है: कॉन्सेप्ट जिज्ञासा जगाता है, पर पटकथा शुरू से अंत तक वैसा नियंत्रण नहीं रख पाती।

द वान फिल्म से प्रेरित धुंध भरा जंगल का गांव, लालटेन से रोशन घर और झरने
धुंध में लिपटा पहाड़ी गांव, लालटेन की रोशनी वाले घर और झरने, द वान के माहौल से प्रेरित दृश्य।

निर्देशन और स्क्रीनप्ले

फिल्म का निर्देशन दीपक कुमार मिश्रा ने किया है, जबकि मौजूदा फिल्म क्रेडिट्स में लेखन के लिए अरुणाभ कुमार (Arunabh Kumar) और आनंदेश्वर द्विवेदी (Anandeshwar Dwivedi) के नाम दर्ज हैं। IMDb पर फ़िलहाल अरुणाभ कुमार और दीपक कुमार मिश्रा, दोनों को डायरेक्टर बताया गया है, इसलिए विस्तृत श्रेय के लिए फिल्म के आधिकारिक एंड क्रेडिट्स को ही अंतिम आधार मानना चाहिए।

निर्देशन सबसे ज़्यादा तब असर करता है, जब फिल्म हर बात तुरंत समझाने के बजाय लोककथा को ही सस्पेंस पैदा करने देती है।

पटकथा का केंद्रीय विचार भी स्पष्ट है: ऋषि जंगल को विकास के रास्ते की रुकावट मानता है, जबकि गांववाले उसे बचाकर रखने लायक धरोहर समझते हैं।

यही टकराव अलौकिक कहानी को एक व्यावहारिक आयाम देता है। जंगल की अहमियत सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि वहां कोई रहस्यमयी शक्ति रहती हो सकती है; उसकी कीमत इस बात में भी है कि अलग-अलग किरदार उसे बिल्कुल अलग मायने देते हैं।

दिक्कत यह है कि फिल्म कई बार इस केंद्रित संघर्ष से भटक जाती है और उतना तमाशा व जॉनर-तत्व जोड़ देती है, जितना कहानी सहजता से संभाल नहीं पाती।

क्या द वान एक हॉरर फिल्म है?

द वान में हॉरर और सुपरनैचुरल एलिमेंट्स ज़रूर हैं, लेकिन इसे सिर्फ़ हॉरर फिल्म कहना भ्रामक होगा।

इसे रहस्य, एडवेंचर और अलौकिक तत्वों से भरी लोककथा आधारित फैंटेसी थ्रिलर कहना ज़्यादा सटीक है। मौजूदा लिस्टिंग्स इसे फैंटेसी/मिस्ट्री/थ्रिलर की श्रेणी में रखती हैं, जबकि समीक्षाओं में इसके पौराणिक और हॉरर पहलुओं पर भी चर्चा हुई है।

इसलिए दर्शकों को इसे शुरू से आखिर तक जंप-स्केयर वाली पारंपरिक डरावनी फिल्म समझकर नहीं देखना चाहिए।

फिल्म की असली दिलचस्पी एक स्थानीय किंवदंती के इर्द-गिर्द अलौकिक दुनिया खड़ी करने और फिर उसमें एक संशयवादी नायक को उतारने में है।

द वान रिलीज़ डेट और रनटाइम

द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट 25 सितंबर 2026 को थिएटर्स में रिलीज़ हुई थी।

फिल्म हिंदी भाषा में है और इसे U/A 16+ सर्टिफिकेट मिला है।

प्रकाशित रनटाइम की जानकारी में कुछ विसंगति है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक फिल्म की अवधि 2 घंटे 45 मिनट है, वहीं फ़िल्मफ़ेयर (Filmfare) 2 घंटे 17 मिनट बताता है। IMDb पर भी फ़िलहाल 2 घंटे 45 मिनट दर्ज है। चूंकि ये आंकड़े मेल नहीं खाते, टिकट बुक करने से पहले अपने नज़दीकी सिनेमाघर में दिखाया गया रनटाइम ज़रूर जांच लें।

द वान OTT रिलीज़: ऑनलाइन कहां देख सकते हैं?

30 सितंबर 2026 तक फिल्म मुख्य रूप से थिएट्रिकल रिलीज़ में ही चल रही है।

OTT से जुड़ी रिपोर्ट्स के अनुसार थिएटर रन ख़त्म होने के बाद डिजिटल रिलीज़ की उम्मीद है, लेकिन जब तक संबंधित प्लेटफ़ॉर्म या फिल्म की आधिकारिक टीम घोषणा न करे, किसी भी स्ट्रीमिंग डेट को पक्का नहीं मानना चाहिए।

ताज़ा OTT अपडेट के लिए किसी पुरानी “संभावित रिलीज़ तारीख” पर भरोसा करने से बेहतर है कि प्लेटफ़ॉर्म की मौजूदा लिस्टिंग देखी जाए।

द वान स्टार कास्ट और क्रू

मुख्य कलाकार

  • सिद्धार्थ मल्होत्रा – ऋषि
  • तमन्ना भाटिया – ममता
  • अनूप सोनी – शशि भैया
  • श्वेता तिवारी – सुशीला
  • सुनील ग्रोवर – दीपक
  • मनीष पॉल – वीपी
  • दुर्गेश कुमार – पत्रकार

क्रेडिट पाने वाले अन्य कलाकारों में संदीप वेद (Sundip Ved), अजय राजू (Ajay Raju), अक्षान सहरावत (Akshaan Sehrawat) और अनिकेत संघवी (Aniket Sanghavi) शामिल हैं।

द वान स्टार कास्ट: रहस्यमयी वन मंदिर की खोज करते सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया
द वान में रहस्यमयी जंगल के मंदिर की ओर बढ़ते सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया।

मुख्य क्रू

  • डायरेक्टर: दीपक कुमार मिश्रा
  • अतिरिक्त निर्देशन क्रेडिट: अरुणाभ कुमार
  • लेखक: आनंदेश्वर द्विवेदी और अरुणाभ कुमार
  • सिनेमैटोग्राफी: मनु आनंद (Manu Anand)
  • एडिटर: नितिन बैद (Nitin Baid)

अलग-अलग डेटाबेस में क्रेडिट्स अलग ढंग से दिख सकते हैं, इसलिए विस्तृत क्रू लिस्ट के लिए आधिकारिक एंड क्रेडिट्स को प्राथमिकता देनी चाहिए।

फाइनल वर्डिक्ट: द वान रिव्यू

हमारे द वान रिव्यू का निचोड़ यह है कि द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट का आइडिया उसके असमान निर्वाह से कहीं ज़्यादा मज़बूत है।

फिल्म का सबसे बढ़िया हिस्सा ऋषि का निजी अतीत, विरासत की ज़मीन, वन देवी की किंवदंती और वर्जित जंगल के मेल से निकलता है। ये तत्व कहानी को आगे बढ़ने की असली वजह देते हैं, न कि अलौकिक सेटिंग को सिर्फ़ माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

सिद्धार्थ मल्होत्रा केंद्रीय भूमिका में जंचते हैं, क्योंकि ऋषि का संदेह पहले हाफ़ को एक साफ़ दृष्टिकोण देता है। तमन्ना भाटिया ममता के ज़रिए और ऋषि के साथ उसके रिश्ते के माध्यम से कहानी में भावनात्मक वज़न जोड़ती हैं।

सबसे बड़ी सीमा पटकथा की वह आदत है, जिसमें वह बार-बार एक जॉनर से दूसरे जॉनर में छलांग लगाती है। लोककथा और रहस्य उत्सुकता तो पैदा करते हैं, पर कहानी के एक्शन-प्रधान और ज़्यादा अलौकिक होते ही फिल्म का फ़ोकस हर जगह बरकरार नहीं रह पाता।

यही वजह है कि आलोचकों की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है। कुछ समीक्षकों ने कॉन्सेप्ट, लोककथा और विज़ुअल ट्रीटमेंट की सराहना की, तो कुछ को लेखन और दूसरे हाफ़ का निर्वाह कम विश्वसनीय लगा।

कुल मिलाकर, द वान को पारंपरिक हॉरर फिल्म के बजाय लोककथा पर आधारित फैंटेसी थ्रिलर के तौर पर देखना बेहतर रहेगा। इसका मूल विचार और परिवेश इसके सबसे बड़े आकर्षण हैं, जबकि ऊबड़-खाबड़ स्क्रीनप्ले ही दर्शकों के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट किस बारे में है?

यह फिल्म ऋषि नाम के एक सिविल इंजीनियर की कहानी है, जो विरासत में मिली ज़मीन का मामला निपटाने अपने पुश्तैनी गांव लौटता है। वन देवी की स्थानीय किंवदंती और गांववालों द्वारा वर्जित माने गए जंगल से सामना होते ही उसकी योजनाएं पेचीदा हो जाती हैं।

ऋषि अपने गांव वापस क्यों जाता है?

वह पुश्तैनी संपत्ति का निपटारा करके ज़मीन बेचने के इरादे से लौटता है। यह वापसी उसे उसके अतीत के एक दुखद अध्याय से भी दोबारा रूबरू कराती है।

द वान में ममता कौन है?

तमन्ना भाटिया द्वारा निभाई गई ममता ऋषि की पत्नी और स्कूल टीचर है। ऋषि के साथ उसका रिश्ता उसी निजी इतिहास से जुड़ा है, जो उसे गृहनगर वापस खींच लाता है।

फिल्म में वन देवी का क्या संबंध है?

वन देवी जंगल से जुड़ी किंवदंती के केंद्र में मौजूद लोककथा की आकृति हैं। फिल्म इसी आस्था को अपने अलौकिक रहस्य का आधार बनाती है।

क्या द वान सच्ची कहानी पर आधारित है?

फिल्म लोककथाओं और पारंपरिक मान्यताओं से प्रेरणा लेती है, लेकिन इसकी मुख्य कहानी और अलौकिक घटनाएं काल्पनिक हैं। इन्हें किसी दस्तावेज़ी सत्य घटना की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए।

क्या द वान एक हॉरर मूवी है?

इसमें डर और अलौकिकता के तत्व हैं, पर इसका दायरा एक आम हॉरर फिल्म से बड़ा है। यह फैंटेसी, मिस्ट्री, थ्रिलर, एडवेंचर और लोककथा का मिश्रण है।

द वान का निर्देशन किसने किया है?

दीपक कुमार मिश्रा को निर्देशक के रूप में क्रेडिट मिला है, और मौजूदा डेटाबेस निर्देशन क्रेडिट्स में अरुणाभ कुमार का नाम भी शामिल करते हैं।

द वान कब रिलीज़ हुई?

यह फिल्म 25 सितंबर 2026 को देशभर के सिनेमाघरों में पहुंची।

क्या द वान OTT पर उपलब्ध है?

30 सितंबर 2026 की स्थिति के अनुसार फिल्म अभी मुख्य रूप से थिएट्रिकल विंडो में है। किसी निश्चित OTT तारीख के लिए संबंधित प्लेटफ़ॉर्म की नवीनतम आधिकारिक घोषणा देखें।

क्या द वान देखने लायक है?

यह आपकी अपेक्षाओं पर निर्भर करता है। भारतीय लोककथाओं, अलौकिक रहस्यों और फैंटेसी एडवेंचर में रुचि रखने वाले दर्शकों को इसका प्रीमाइस पसंद आ सकता है। वहीं, कसी हुई थ्रिलर चाहने वालों को स्क्रीनप्ले की असमान गति और बदलते जॉनर ज़्यादा खटक सकते हैं।

Ashish Kathiriya